The Brahma Sutra is one of the three principal works of Vedanta, the other two being the Upanishads and the Bhagavad Gita. These sutras were composed by Badarayana Vyasa, and Sri Shankaracharya wrote his masterly commentary on these sutras. Sri Shankaracharya’s introduction to the Brahma Sutra is a masterpiece in itself. It is said that those who are not in a position to study the entire Brahma Sutra may at least study the first four sutras. The first four sutras contain in them all that Vedanta has to teach us. Hence there is a practice of studying the first four sutras independently. The first four sutras are referred to as “Chatuh Sutri”.
I would like to watch a video on your library, talking about the books and book series you own. Also if you could provide a list or a HD photo of the library, that would be suffice.
नमस्ते बंधु आपने बहुत उत्तम ढंग से समझाया किंतु मैं उसे कितना समझा, और जो भी समझा वो कितना सही है, उसकी आपसे पुष्टि चाहता हूं। ब्रह्म में ही प्रकृति है और ब्रह्म के स्पंदन से प्रकृति गतिमान होती है जिस तरह शुक्राणु गतिशील होता है और अंडाणु गतिहीन।जब शुक्राणु गति करते हुए जा कर अंडाणु से मिलता है तब सृजन आरंभ हो जाता है। यानि ब्रह्म रहते हुए भी प्रकृति अपने लक्षणो के कारण ब्रह्म से भिन्न होती है अर्थात ब्रह्म और प्रकृति इन दोनो के लक्षण व गुण भिन्न होते हैं यद्यपि प्रकृति रहती ब्रह्म में ही है। ब्रह्म का प्रकृति को स्पंदित करना सृष्टि का जन्म है, और यह स्पंदन जब प्रकृति में उसी प्रकार विलीन हो जाता है जैसे शुक्राणु एक अंडाणु मे और शिशु बनाना आरंभ हो जाता है,और जब शिशु पूर्ण रूप से बन जाता है तो गर्भ से बाहर आ जाता है अर्थात सृष्टि प्रकट हो जाती है। जिस प्रकार वह शिशु विकास करता है और जब तक मृत्यु को प्राप्त नहीं होता है , उसी प्रकार सृष्टि भी अस्तित्व में रहती है। जैसे वो शिशु अपना जीवन पूरा कर लेता है वैसे ही सृष्टि का लोप (प्रलय) हो जाता है। मेरा सवाल अब आता है-क्या प्रकृति उसी प्रकार फिर गतिहीन अंडाणु की स्थिति को प्राप्त हो जाती है और ब्रह्म फिर उससे भिन्न अपने मूल लक्षण में आ जाता है। या यूं कह लेते हैं कि ब्रह्म और प्रकृति का मिलन सृष्टि का आधार है और उनका पुन: अपने अपने मूल लक्षणों को प्राप्त करने के लिए अलग हो जाना सृष्टि का लोप। और यह प्रक्रिया यूं ही निरंतर चलती रहती है। अब आता है मेरा दूसरा प्रश्न। क्या ब्रह्म में ही स्थित प्रकृति से ब्रह्म स्वत: ही स्पंदन द्वारा सृष्टि प्रकट करता है या इस क्रिया के लिए कोई तीसरा तत्व भी है जो उत्प्रेरक का कार्य करता है। वैसे तो आपने यहां कहा कि उसकी इच्छा हुई किंतु यह इच्छा होना कुछ तर्कपूर्ण नहीं लगता है। तो एक तीसरा तत्व अवश्य होना चाहिए।वो तीसरा तत्व क्या है? क्या वो जीवात्मा तो नहीं? आशा है उत्तर अवश्य मिलेगा साभार
Thank you for this great service! Much indebted to you. I have a small question - how is paribhraman perceived not to be material cause and only efficient cause. The iron is also coming from Parabrahma, and it is He who transforms it into steel as well, while hiding the chitta and Anand properties and leaving it with only Sat. Kindly clarify my confusion. Thanks a lot
गुरुजी प्रणाम 🙏 हमारे तुच्छ विवेक में ये विचार भ्रम उत्पन्न के रहा है कि यदि ब्रह्म के हलचल से प्रकृति में जीवन उत्पन्न हुआ तो प्रकृति का आविर्भाव कैसे हुआ । या ये समझा जाए की चूंकि ब्रह्माण्ड हिरण्यगर्भ है तो ये प्रकृति उन्हीं ब्रह्म के cosmos में पोषित हुईं थीं स्वतः। अनुरोध है गुरूजी उत्तर दें 🙏
अदभुत सर।बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
ॐ.... Aum.... Tat... Sat
उत्कृष्ट संप्रेषण शैली
आनंददायक ❤❤❤
The Brahma Sutra is one of the three principal works of Vedanta, the other two being the Upanishads and the Bhagavad Gita. These sutras were composed by Badarayana Vyasa, and Sri Shankaracharya wrote his masterly commentary on these sutras.
Sri Shankaracharya’s introduction to the Brahma Sutra is a masterpiece in itself. It is said that those who are not in a position to study the entire Brahma Sutra may at least study the first four sutras. The first four sutras contain in them all that Vedanta has to teach us. Hence there is a practice of studying the first four sutras independently. The first four sutras are referred to as “Chatuh Sutri”.
Thanks for simplifying this complex subject. 🙏
Shortly__Brahma sotto Jagat mithha.ok🙏🙏
आचार्य जी प्रणाम l बहुत अच्छे तरीके से सूत्र को स्पष्ट करते हुए समझाया है l बहुत बहुत धन्यवाद् l
नमस्ते जी
आपका समझाने का तरीका सरल, सुन्दर है, बहुत ही अच्छा लगा। बहुत बहुत धन्यवाद 🙏🙏
ब्रह्म तत्व, माया तत्व,जगत तत्व, और जिबात्मा तत्व जान्न आवश्यक है।
बहुत अच्छी तरह से समझाया है आपने. आपका धन्यवाद 🙏🙏
तस्मै श्रीगुरवे नम:
Aapka bahut bahut aabhar
This is a great service you are doing. Lessons on the Brahma Sutras are difficult to find and even more difficult to make. God bless you! 😇🙏
हर कुछ वर्षों पश्चात ब्रह्मसूत्र पर विचार व्यक्त करते रहें।
❤so good teaching
Beautiful…
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शोभनम् गुरु जी
With respects.
This channel is so underrated
Excellent explanation ,
अति सुन्दर
👌
thank u sir
ज्ञानवर्धक एवं रोचक, सुंदर व्याख्या
Absolutely great words on our Vedas and good translation of meanings
बहुत बढ़िया
🙏🙏🙏🙏🙏
आचार्य श्री कृपया इस व्याख्यान माला को जारी अवश्य रखें।
I can't thank you enough for this sir
Excellent explain guru ji
Commendable job sir 🙏🏻
The Brahma Sutras can be avaiable in gujarati langauge?
Nice explanation without heavynees.
Dhanyavaad
Simple but great
👍🏻👍🏻
नमस्ते बंधु
आपने बहुत उत्तम ढंग से समझाया किंतु मैं उसे कितना समझा, और जो भी समझा वो कितना सही है, उसकी आपसे पुष्टि चाहता हूं।
ब्रह्म में ही प्रकृति है और ब्रह्म के स्पंदन से प्रकृति गतिमान होती है जिस तरह शुक्राणु गतिशील होता है और अंडाणु गतिहीन।जब शुक्राणु गति करते हुए जा कर अंडाणु से मिलता है तब सृजन आरंभ हो जाता है।
यानि ब्रह्म रहते हुए भी प्रकृति अपने लक्षणो के कारण ब्रह्म से भिन्न होती है अर्थात ब्रह्म और प्रकृति इन दोनो के लक्षण व गुण भिन्न होते हैं यद्यपि प्रकृति रहती ब्रह्म में ही है।
ब्रह्म का प्रकृति को स्पंदित करना सृष्टि का जन्म है, और यह स्पंदन जब प्रकृति में उसी प्रकार विलीन हो जाता है जैसे शुक्राणु एक अंडाणु मे और शिशु बनाना आरंभ हो जाता है,और जब शिशु पूर्ण रूप से बन जाता है तो गर्भ से बाहर आ जाता है अर्थात सृष्टि प्रकट हो जाती है।
जिस प्रकार वह शिशु विकास करता है और जब तक मृत्यु को प्राप्त नहीं होता है , उसी प्रकार सृष्टि भी अस्तित्व में रहती है।
जैसे वो शिशु अपना जीवन पूरा कर लेता है वैसे ही सृष्टि का लोप (प्रलय) हो जाता है।
मेरा सवाल अब आता है-क्या प्रकृति उसी प्रकार फिर गतिहीन अंडाणु की स्थिति को प्राप्त हो जाती है और ब्रह्म फिर उससे भिन्न अपने मूल लक्षण में आ जाता है।
या यूं कह लेते हैं कि ब्रह्म और प्रकृति का मिलन सृष्टि का आधार है और उनका पुन: अपने अपने मूल लक्षणों को प्राप्त करने के लिए अलग हो जाना सृष्टि का लोप।
और यह प्रक्रिया यूं ही निरंतर चलती रहती है।
अब आता है मेरा दूसरा प्रश्न।
क्या ब्रह्म में ही स्थित प्रकृति से ब्रह्म स्वत: ही स्पंदन द्वारा सृष्टि प्रकट करता है या इस क्रिया के लिए कोई तीसरा तत्व भी है जो उत्प्रेरक का कार्य करता है।
वैसे तो आपने यहां कहा कि उसकी इच्छा हुई किंतु यह इच्छा होना कुछ तर्कपूर्ण नहीं लगता है।
तो एक तीसरा तत्व अवश्य होना चाहिए।वो तीसरा तत्व क्या है?
क्या वो जीवात्मा तो नहीं?
आशा है उत्तर अवश्य मिलेगा
साभार
Ye class mujhe bhi join karna h ....guru ji🙏🙏
Thank you for this great service! Much indebted to you.
I have a small question - how is paribhraman perceived not to be material cause and only efficient cause. The iron is also coming from Parabrahma, and it is He who transforms it into steel as well, while hiding the chitta and Anand properties and leaving it with only Sat. Kindly clarify my confusion. Thanks a lot
आचार्य जी व्याख्या ज्यादा विस्तार में है।
Is it required to read and understand Upnishad before BrahmaSutra? Or what is the best sequence?
It will be better to learn Upanishadas before Brahmasutra.
Both of these can go simultaneously also.
गुरुजी प्रणाम 🙏 हमारे तुच्छ विवेक में ये विचार भ्रम उत्पन्न के रहा है कि यदि ब्रह्म के हलचल से प्रकृति में जीवन उत्पन्न हुआ तो प्रकृति का आविर्भाव कैसे हुआ ।
या ये समझा जाए की चूंकि ब्रह्माण्ड हिरण्यगर्भ है तो ये प्रकृति उन्हीं ब्रह्म के cosmos में पोषित हुईं थीं स्वतः।
अनुरोध है गुरूजी उत्तर दें 🙏
Aadi means 1st hota hai..?
Yes
@@VedicInsightSuryaNandaआप आर्य समाज़ी हो क्या
गुरुदेव ! आपने कितना अध्यन किया होगा ।
आपको ब्रह्मसूत्र बताने में आनंद आता होगा कि यह तो मेरा ही कार्य है
।
Ap bhot acha smjate pr hindi me smjaoo Eng me thoda problem hota hai
ha ha ha... uski huliyath kya hai ...
Mm b
Sir, you are just translating,nothing from your side.
Bevkuf achhe se batao
Bakwaas Vyakhyaa hain....Sabse accha aur Satik vykhayaa Mere Guru V.G.Narayan ki hai
Please concentrate on the point, don't waste time on irrelevant matter.
अति सुन्दर